ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
ब्रिटिश शासनकाल में सर्वप्रथम बोर्ड ऑफ रेवेन्यू की स्थापना मुर्शिदाबाद में की गई थी। तत्पश्चात लगभग वर्ष 1773 में बोर्ड ऑफ रेवेन्यू को फोर्ट विलियम, कलकत्ता में गवर्नर जनरल की सहायता हेतु स्थापित किया गया। उस समय राजस्व प्रशासन के संबंध में बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ही प्रमुख प्राधिकारी था।
वर्ष 1801 में उत्तर प्रदेश के कुछ जिले ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधिकार क्षेत्र में आने पर प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से इस क्षेत्र को एक लेफ्टिनेंट गवर्नर तथा बोर्ड ऑफ कमिश्नर्स के अधीन कर दिया गया। यह कमिश्नर्स का बोर्ड कलकत्ता स्थित बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करता था। यह व्यवस्था वर्ष 1803 तक प्रभावी रही।
इसके उपरांत बोर्ड ऑफ कमिश्नर्स को भंग कर दिया गया और कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के निर्देशानुसार बोर्ड ऑफ रेवेन्यू द्वारा ही इन कार्यों का संचालन किया जाने लगा। वर्ष 1807 में पुनः एक विशेष कमिश्नर्स बोर्ड का गठन किया गया, जिसका कार्य बंदोबस्त की देखरेख करना तथा कलेक्टरों के कार्यों पर नियंत्रण रखना था। समय-समय पर प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुरूप इस संरचना में परिवर्तन किए जाते रहे। अंततः वर्ष 1831 में बोर्ड ऑफ रेवेन्यू की स्थापना प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) में की गई।
बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के कार्य-कलाप
राजस्व परिषद, उत्तर प्रदेश राज्य के राजस्व प्रशासन की सर्वोच्च संस्था है, जो भूमि संबंधी प्रशासन, अभिलेख प्रबंधन तथा राजस्व न्यायिक प्रणाली के प्रभावी संचालन हेतु उत्तरदायी है। यह परिषद राज्य में राजस्व व्यवस्था को पारदर्शी, उत्तरदायी एवं सुदृढ़ बनाने के लिए निरंतर कार्यरत है।
परिषद का मुख्य उद्देश्य भूमि अभिलेखों को शुद्ध एवं उन्हें अघतन रखना, राजस्व संग्रह की प्रभावी व्यवस्था, राजस्व विवादों का त्वरित एवं निष्पक्ष निस्तारण सुनिश्चित करना है। इसके अतिरिक्त, यह संस्था राजस्व न्यायालयों की निगरानी, नीतिगत दिशा-निर्देश जारी करने तथा प्रशासनिक सुधारों को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
राजस्व परिषद, उत्तर प्रदेश भूमि सुधार कार्यक्रमों के क्रियान्वयन, विशेष रूप से जमींदारी उन्मूलन के उपरांत उत्पन्न प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित हुई है। वर्तमान में यह संस्था आधुनिक तकनीक के माध्यम से भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण तथा पारदर्शिता को बढ़ावा देने की दिशा में कार्य कर रही है।
प्रमुख प्रशासनिक कार्य
- मंडलायुक्तों, जिलाधिकारियों, उपजिलाधिकारियों एवं तहसीलदारों के कार्यों का पर्यवेक्षण एवं नियंत्रण।
- तहसीलदार, नायब तहसीलदार एवं अन्य राजस्व कार्मिकों की स्थापना।
- मंडलीय एवं जनपदीय कार्यालयों का संचालन।
- लेखा संगठन का प्रबंधन।
- शासकीय सम्पत्तियों एवं उपनिवेश योजनाओं का प्रशासन।
- सर्वेक्षण एवं बंदोबस्त कार्य।
- भू-अभिलेखों का संधारण।
- कृषि एवं भूमि संबंधी सांख्यिकी का संकलन एवं प्रकाशन।
- भूमि सुधार कार्यक्रमों का क्रियान्वयन।
- राजस्व कार्मिकों का प्रशिक्षण।
- जमींदारी उन्मूलन से संबंधित कार्य।
- प्रतिकर भुगतान से संबंधित कार्य।
- भूमि सीमा अधिनियम का प्रशासन।
- भूमि अर्जन कार्य।
- तक़ावी ऋणों का प्रबंधन।
- विभिन्न शासकीय देयों की वसूली।
- आपदा राहत (बाढ़, सूखा आदि) में सहयोग।
- राजस्व भवनों का रख-रखाव।
- राजस्व न्यायालयों के कार्यों का पर्यवेक्षण।
- जनगणना एवं लघु बचत कार्य।
- शरणार्थी/त्यागी सम्पत्तियों का प्रबंधन।
विभागाध्यक्ष के रूप में भूमिका
राजस्व परिषद निम्नलिखित पदों/भूमिकाओं में विभागाध्यक्ष के रूप में कार्य करती है:
- भू-अभिलेख निदेशक
- भूमि सुधार आयुक्त
- प्रतिकर आयुक्त
- बंदोबस्त आयुक्त
- अन्य राजस्व कार्मिकों के विभागाध्यक्ष
न्यायिक कार्य
राजस्व परिषद की न्यायिक शाखा, जो लखनऊ एवं प्रयागराज स्थित परिसरों में कार्यरत है, विभिन्न माननीय सदस्यों के माध्यम से मुख्य रूप से निम्न अधिनियमों के अंतर्गत अपील एवं पुनरीक्षण संबंधी कार्य संपादित करती है।
- उ.प्र.राजस्व संहिता 2006
- उ.प्र. जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम
- उ.प्र. भूमि राजस्व अधिनियम
- विभिन्न काश्तकारी अधिनियम
- भारतीय स्टाम्प अधिनियम
यह संस्था राज्य सरकार को राजस्व प्रशासन से संबंधित नीतियों के निर्माण एवं क्रियान्वयन में सहयोग प्रदान करती है तथा क्षेत्रीय तंत्र के माध्यम से समस्त राजस्व कार्यों का समन्वय, निर्देशन एवं पर्यवेक्षण सुनिश्चित करती है।